Thursday, February 11, 2010

कुंवे पर चना भूनते हुए

पिछले साल जब हरनावदा गए तो कुंवे पर भी गए। वहां गंभीर सिंह भैया ने हरा चना भून कर बच्चों को खिलाया। चना भूनने में सबने अपना अपना योगदान दिया। छोटा भाई सुरेन्द्र और उसके बच्चों, मेरी बेटी और प्रयाग के बच्चों ने भी हाथ बंटाया। इस कुंवे पर खेलते हुए और काम करते हुए ही मेरा अधिकांश बचपन बीता है। यही नहीं मैंने येहाँ यहाँ आम और अमरुद के पेड़ों की शाखों पर बैठ कर पढ़ा भी बहुत है। कवितांए और कहानियाँ भी लिखी है । दाल बाटी कई बार खाई। और सबसे बड़ी बात तो ये की यहाँ बचपन में राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त की 'पंचवटी' को पढ़ा था और (शायद) सुमित्रानंदन पन्त की जीवनी भी पढी थी। मेरे जाने तब ही मेरे मन में ये ख्याल आया था की मुझे भी ऐसा ही बनना है। और मैं कविता में या कविता की शब्दावली में सोचने लगा था। ये बात साल १९७५ से ७७ के बीच की होगी। इस समय तक मैं गंभीरसिंह भैया के पास इंदौर पढ़ने आ गया था। और क्योंकि छोटी क्लास में अपने उम्र के बच्चों के बीच गाँव में से मैं अकेला पढ़ने के लिए इंदौर गया था इसलिए अपने को 'ख़ास' समझाने लगा था। तो शायद मेरे मन में 'पंचवटी' और पन्त जी के बारे में पढ़ते हुए 'ख़ास' करने की इच्छा जागी होगी। ये इच्छा जहां जगी थी, वह खेत अभी भी वैसा ही है। वहां माँ के साथ निंदाई गुडाई करते हुए मेरे मन में कवि बनाने की इच्छा पैदा हुयी थी। अब पता नहीं क्या क्या बना हूँ, कविता, कहानी, लेख, सब लिखते हुए फोटोग्राफी और फिल्म बनाने का काम भी कर रहा हूँ। पर लगता है की कुछ भी बन जाऊं पर मेरा खेत और मेरा कुंवा आज भी मेरे कुछ बनने की राह देख रहा है। यदि कुछ बन पाया तो कुंवे और खेत ही मेरी जड़ होंगे, चाहे कहीं रहूँ। ... इसलिए फिलहाल कुंवे और खेत की याद में हरे चने भूनने के कुछ फोटोग्राफ नत्थी कर रहा हूँ। ये फोटो सन २००९ के हैं।
- अमी चरणसिंह
११ फरवरी २०१० इंदौर

Friday, January 29, 2010

ईश्वर आये तो---

पिछली 27 जनवरी से मेरे गाँव हरनावदा में करीब 15 लाख रुपयों के बजट से एक महायज्ञ हो रहा है । जब मैं 1992 में जे एन यू से गाँव आया था तो मैंने योजना बनाई थी की अपने गाँव में विकास के कुछ काम करूंगा। किन्तु गाँव के लोगों ने रूचि नहीं ली। पैसा इकट्ठा नहीं हुआ। पर आज देखता हूँ की धर्मं के नाम पर १५-२० लाख फूंके जा रहे हैं। मठाधीशों के बहकावे में युवा पीठी और पूरा गाँव गाढ़ी कमाई के पैसे लगाने को तैयार है। उन्हें विश्वास है की पुण्य मिलेगा, ईश्वर के दर्शन मिलेंगे। पता नहीं गाँव वालों को क्या मिलेगा। पर पंडितों, पुजारियों, साधुओं और मठाधीशों को अच्छा पैसा मिलेगा। आम की ढेरों लकड़ी फूंकी जाएगी। १० दिनों तक कामकाज ठप्प रहेगा। युवा शक्ति को जीवनभर धर्म की झूठी दुनिया में जीने की प्रेरणा मिलेगी। --- बहरहाल एक कविता श्रंखला ईश्वर को लेकर मैंने लिखी थी। उसकी एक कविता यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ। 'ईश्वर आये तो---'। मुलाहिजा फरमाइए।

ईश्वर आये तो---

बहुत कुछ इकठ्ठा हो गया है
शिकवा शिकायत के लिए--
बस इन्तेजार है ईश्वर के आने का
---- जन्मने की पीड़ा -
पनपने का संघर्ष -
गृहस्थी का घर्षण -
जीने की तृष्णा -
हवा की दिशा -
प्रकाश की बदमाशी -
अँधेरे की सघनता -
आकाश की शून्यता -
पानी की आबहीनाता -
आत्मा की अनास्था -
खून की सफेदी ----
सुख की कंगाली में
की गयी बेचैन यात्राओं में
समेटे गए
अनावृत आत्माओं के
संस्मरण---

बहुत कुछ इकठ्ठा हो गया है
शिकवा शिकायत के लिए
ईश्वर आये तो -----
- अमी चरण सिंह

आप इस कविता का पाठ करें तब तक मैं अपने घर के, गाँव वालों के बुलावे पर महायज्ञ में चक्कर लगाकर आता हूँ। यदि ईश्वर मिला तो अपनी सुनाने के लिए। लोटकर बताऊंगा की क्या बात हुई ईश्वर से।

Saturday, October 31, 2009

कि जो उड़ती है एक पतंग

कि जो उड़ती है एक पतंग
आकाश में,
पहुँचने को आतुर
बादलों के पार।

कि जो उड़ती है एक पतंग
उड़कर वह पहुंचती है
बादलों के पार।

कि जो उड़ती है एक पतंग
और लोट आती है
बादलों के पार से ,
लेकर संदेश कि
पूर्वजों के पास अब भी है
कहने को कुछ शेष।

कि जो उड़ती है एक पतंग
वही अब
माध्यम है संवाद का
मेरे और
पूर्वजों के मध्य।
- अमी चरणसिंह
लिखी १२-१०- २००१ रात्रि १०:३४ पर

Tuesday, July 14, 2009

‘प्रेरणा’ का जून - जुलाई २००९ अंक



मित्रो ,
भोपाल से प्रकाशित होनेवाली साहित्यिक पत्रिका ‘प्रेरणा ’ का नया अंक आया है । इसके संपादक हैं श्री अरुण तिवारी । अरुण जी अपने सतत प्रयासों से पिछले ११ सालों से इसका प्रकाशन जारी रखे हुए हैं । जाहिर है इस लम्बी अवधि में उनके सामने अनेक कठिनाइयां आई होंगी , पत्रिका बंद होकर चालू हुई होगी , लोग जुड़ते -टूटते -जुड़ते रहे होंगे । पर आज जिस मुकाम पर ‘प्रेरणा’ को अरुण जी ले आए हैं , वह कबीले तारीफ है । मैंने पिछले कुछ अंक देखे हैं । इसकी प्रष्ट संख्या अच्छी -खासी होती है , लगभग दो सौ के आस पास। सामग्री की विविधता सभी विधाओं की रूचि के पाठकों के लिए पर्याप्त खुराक देती है । कहा जा सकता है की यह हर संजीदा पाठकों के लिए जरूरी पत्रिका है ।
‘प्रेरणा ’ के ताजे अंक (जून जुलाई 2009) की चर्चा करें तो सभी विधाओं में ५८ रचनाकारों की दी गयी हैं । विधाओं का विभाजन करें तो ‘ बहस के लिए ’, स्मरण , आलेख , विमर्श , चिंतन , कहानी , लघुकथा , कविता , गजल , रपट , पुस्तक चर्चा , लघु /छोटी /साहित्यिक पत्रिकायों के अंकों की चर्चा के साथ ही पाठकों की लगभग समीक्षात्मक लम्बी चिट्ठियों को यहाँ पढ़ा जा सकता है । इस में साक्षात्कार नहीं है , किंतु ‘प्रेरणा ’ में अच्छे -खासे लंबे साक्षात्कार छपते रहें हैं , जैसे राजेश जोशी का चर्चित साक्षात्कार छपा था । बहारहल ‘प्रेरणा ’ का यह अंक पाठको को अच्छी खुराक देता है । ‘ प्रेरणा’ प्राप्त करने के लिए यहाँ संपर्क करें :
श्री अरुण तिवारी
संपादक ' प्रेरणा'
ऐ-७४, पैलेस आर्चर्ड फ़ज-३, सर्व धर्म के पीछे
कोलर रोड, भोपाल-४२
ईमेल- प्रेरणा_मगज़िने@याहू.कॉम
वेबसाइट : डब्लू डब्लू डब्लू डॉट प्रेरणा मैगजीन डॉट काम

इस ताजे अंक से ब्लॉग पाठकों के लिए मेरी एक कविता यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ ‘चींटियाँ निकलती हैं ’ जो इसके पेज नम्बर 111 पर छपी है । बाकी दो अन्य कविताओं के अंश, जो मुझे पसंद आए ।

चींटियाँ निकलती है
-अमी चरणसिंह
चींटियाँ निकल जाती हैं
लम्बी यात्राओं पर
अक्सर

जाती हैं वे कहीं
कुछ इस अनुशाशन और
उत्साह के साथ की
जा रही हों मानो
किसी तीर्थयात्रा पर

'हमेशा चलायमान रहना
सीखा जा सकता है
चींटियों से'
यह कथन बड़ा उपदेशक है
मगर क्या आपने कभी
किसी चींटी को
आराम फरमाते देखा है ?

वे तेजी से गुजरती हैं
कुछ इस व्यस्तता से
जैसे धीमी चली तो
छुट जायेगी बस
और झिड़की खाना पड़ेगी
बाबू की तरह

जिस रास्ते -गली से
निकलती हैं चींटियाँ
उस रस्ते-गली में
सामने से आनेवाली
हमजात चींटी से
एक पल को दुआ सालाम
करने से नहीं कतरातीं
सडकों पर भटकते
हम जैसे लोगों की तरह
मुंह नहीं चुराती चीन्तीयाँ
अपने मुंह में थामे
अनाज का कोई दाना
रोटी का कोई कण
बड़ी शान और
खुशी से जाती है
अपने घर की तरफ़ चींटी
चींटीं को नहीं चाहिए
हमारी तरह
आवश्यकता से अधिक अन्न
कोठार में भरने के लिए।
-अमी चरणसिंह

डॉक्टर पुष्पिता अवस्थी की कविता 'पसीने का इतिहास' से :
सूरी नाम की पग्दंदियाँ
'मां की तरह' इन्तेजार करती हैं
मजदूर गरीब पैरों को
घर तक पंहुंचने के लिए।

नहरों के पानी में
दिखायी देता है
भारतवंशियों के
पसीने का इतिहास।

केशव शरण की कविता 'एक हलवाहे का हल चलाना देखकर' का अंश:
वह हल चलाता है
और मजूरी पाता है
वह जो मजूरी पाता है
उसी से घर चलाता है
वह कैसे लाता है घर
मैं नहीं जानता
मगर मैं देख रहा हूँ
कैसे चलाता है हल।

Monday, July 13, 2009

मधुबनी कलाकार यशोदा देवी

मधुबनी लोक कला की महान चितेरी यशोदा देवी

मित्रो,

मधुबनी कलाकार यशोदा देवी की कला से अमूमन हर कलाप्रेमी परिचित है। वे बिहार की प्रसिद्ध मधुबनी कला की महान कलाकार थीं। उन्हें काम करते हुए देखना निशिचित ही सुखद अनुभव होता था। सन २००७ में वे उज्जैन आईं थीं, कालिदास अकादमी के वर्नागम कला शिविर में शिरकत करने हेतु। मेरे मित्र और कलाकार आर पी शर्मा ने अकादमी के लिए शिविर की फ़िल्म बनाने का दायित्व तत्कालिन निदेशक डॉक्टर जगदीश शर्मा के मार्गदर्शन में मुझे दिया था। उस समय के नवागत निदेशक डॉक्टर मिथिलाप्रसाद त्रिपाठी ने भी उस फ़िल्म को पसंद किया था। उसी फ़िल्म का एक हिस्सा यहाँ दे रहा हूँ, जिसमें यशोदा जी हैं। यशोदा जी अब इस दुनिया में नहीं हैं, किंतु उनके पुत्र राजकुमार और पुत्रवधू विभा लाल उनकी कला को आगे बढ़ा रहे हैं। यशोदा जी को श्रद्धांजलि के साथ फ़िल्म के इस हिस्से को आप भी देखें और अपनी प्रतिक्रिया दें। फ़िल्म के इस हिस्से की अवधि १ मिनट २ सेकंड है।

Wednesday, July 1, 2009

कविता की तलाश (मनोहर काजल के फोटोग्राफ को देखते हुए)

साथियों ,

मेरे प्रिय फोटोग्राफ़र श्री मनोहर काजल (दमोह) के फोटोग्राफों ने मुझे हमेशा प्रभावित किया है। उनका एक फोटोग्राफ भोपाल से प्रकाशित होनेवाली पत्रिका 'कला समय' के कवर पर छापा था। उसने मुझे बहुत आकर्षित किया। उसपर कविता लिखकर 'कला समय' के संपादक मित्र श्री विनय उपाध्याय को भेजी। उन्होंने उसे प्रकाशित कर दिया। आज उस कविता को पुनः पढ़ा। सो, वह कविता आपके लिए भी यहाँ दे रहा हूँ:-

कविता का शीर्षक है -

कविता की तलाश

(मनोहर काजल के फोटोग्राफ को देखते हुए)

कविता की तलाश

वहाँ ख़त्म नहीं होती

जहाँ

किसी राजकुमारी की भांति

सज संवरकर बार्बी गुडियाओं का मेला सजाती है

कोई माता पिता की दुलारी ।

कविता मिलती है

ढोलक की थाप पर

कंडे बीनते-बीनते

नृत्य करने के लिए उत्सुक

फटेहाल लड़की की

भदेस काया के इर्द-गिर्द ,

जहाँ चेहरे पर उतर आता है

सारा अवसाद जीवन का ।

वह एक कविता

वहाँ भी नहीं मिलती

जहाँ

ब्रेड पर लगा माखन पसंदीदा न होने पर

तूफ़ान खड़ा कर देता है लाडला ।

कविता मिलती है वहाँ जहाँ

फूस के घर के पिछवाडे

करतब दिखने की रियाज में

भूखे पेट

ढोलक पर

हाथ आजमा रहा होता है

सर पर बांधे पीढियों का बोझ

कोई अनपढ़ गंवई

नंगे पैरों वाला

'कलाकार लड़का' ।

- अमी चरण सिंह

(लिखी १२-१०-२००१)

Monday, June 8, 2009

कलाश्रुति राष्ट्रीय कला शिविर 2008


मित्रो,

मैं साहित्य के साथ-साथ कला गतिविधियों के आयोजन में भी सक्रिय रहता आया हूँ। कलाश्रुति ट्रस्ट के बैनर पर साल २००८ में पहली बार राष्ट्रीय कला शिविर का आयोजन किया था। उसकी रिपोर्ट यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ। साल २००९ में दूसरा राष्ट्रीय कला शिविर आयोजित किया था। उसकी रिपोर्ट भी शीघ्र ही पोस्ट करूंगा।

- अमी चरणसिंह

९ जून २००९, रात्रि ११ बजे

Thursday, June 4, 2009


कविता

अपराधी

- अमी चरणसिंह

कुछ बेचते हैं डर

कुछ अभयदान

कुछ तटस्थता


डर बेचनेवाले

असल में साह्स बेचते हैं

और अभयदान देनेवाले निश्चिन्तता

(जो की ज्यादा खतरनाक होती है)


जो तटस्थता के हिमायती हैं

उनकी फेहरिस्त में

होते हैं

हत्यारों के समर्थन में

ख़ूबसूरत बयां


दरअसल

दुनिया की तमाम

तानाशाहियों के खिलाफ

चुप्पी साध लेनेवाले

ये तटस्थ

हत्यारों के पक्ष में खड़े होते हैं.

-अमी चरणसिंह

०-९९२६५४८०६०