पिछले एक साल से मैं जैन समाज की एक प्रगतिशील शाखा हूमड़ जैन समाज पर फिल्म बना रहा था। उस फिल्म को बनाते समय कई अनुभव हुए। जैसे कि एक जाती कि उत्पत्ति और उसके विकास को करीबी से जाना। मैंने देखा कि कई बार हम लोग अपने इतिहास से परिचित नहीं होते। फिल्म के दौरान पता चला कि कई हूमड़ साथी भी बहुत कुछ बातों से अनभिज्ञ हैं। इस दृष्टि से ये फिल्म सफल भी रही। जैसे कि फिल्म बनाने के पहले हूमड़ जैन समाज इंदौर के अध्यक्ष विपिन गांधी और दीपक मेहता ने विचार प्रकट किये थे कि हमारा लक्ष्य है आज की पीढी को अपने जातीय इतिहास से परिचित करना। और मैंने फिल्म में इस बात का पूरा ध्यान रखा कि एक जाती की संस्कृति, उसकी सामाजिक पहचान, उसकी प्रगतिशील विचारधारा को प्रमाणिकता के साथ उभारा जाए। पर बड़ी समस्या ये आई कि आज के भौतिकवादी परिवेश में इतिहास का सरंक्षण देखने को नहीं मिला। इस कारण बहुत कम सामग्री हमारे हाथ आ सकी। पर ये बात बड़ी अच्छी लगी कि विपिन जी और दीपक मेहता जी पुरे प्राणपन से अपना इतिहास खंगालने में लगे रहे। सूरजमल जी जैन, श्रीमती कौशल्या पतंग्या जी, हंसमुख गांधी जी, प्रमोद बंडी जी आदि अनेक हूमड़ साथी आखिर तक लगे रहे। कई बार अपने इतिहास के प्रति अतिरिक्त मोह के कारण कुछ चीजों पर वाद-विवाद-संवाद भी हुआ, कुछ जगहों पर इसी कारण चीजों पर समजौते करने पड़े, पर अपने इतिहास को देखने का एक बड़ा काम इंदौर हूमड़ जैन समाज ने किया। दरअसल भारत के सांस्कृतिक इतिहास का लेखा-जोखा करें तो वो जातियों के इतिहास से अलग नहीं किया जा सकता। हमें भारतीय समाज के विकास को जानने के लिए, जातियों के इतिहास कि तरफ ही जाना होगा। बस केवल उस इतिहास के प्रति मोहान्ध होने से बचना होगा। तब हम अपने सांस्कृतिक इतिहास को प्रमाणिकता के साथ जान समझ सकेंगे। हूमड़ समाज के इतिहास कि सैर करते हुए ये भी महसूस हुआ कि हम अपने जातीय इतिहास को धर्मं के इतिहास से जोड़ लेते हैं। हालाँकि ये आपस में जुड़े हुए हैं, किन्तु जातीय इतिहास संस्कृति और समाज का, परम्पराओं का, मनुष्यों का लेखा-जोखा होता है, जबकि धर्मं का इतिहास आस्था के पहलू पर इतना जोर देता है कि और चीजें गौण हो जाती है। वह अपने खिलाफ जाती हुई चीज को असहनशीलता की हद तक नकारता है, जबकि जातीय इतिहास बताता है कि किस तरह अपने खिलाफ जाती हुई चीजों के बीच संघर्ष करते हुए अपनी अस्मिता का लोहा मनवाता है। हूमड़ समाज अपने प्रगतिशील तत्वों के कारण कई परम्पराओं को छोड़ चूका है, जैसे दहेज़ प्रथा, मृत्यु भोज, आदि आदि। ये उसके जातीय गौरव के प्रगतिशील तत्व है, जिनको रेखांकित किया जाना चाहिए.....
बहरहाल हूमड़ जैन समाज वाली फिल्म में आरम्भ में नमोकार मंत्र के कुछ अंश दिए थे... चूंकि ये फिल्म एक गैर-व्यावसायिक फिल्म थी इसलिए इस सुगम सुमधुर गीत ने फिल्म के आरंभ में एक अलग ही समा बाँध दिया था।
पाठकों को सुनने के लिए नामोकर मंत्र येहाँ दे रहा हूँ। ये मंत्र अनेक गायकों द्वारा गाया गया है। येहाँ आप लता जी की आवाज में नमोकार मंत्र सुनिए।
थोड़े दिनों बाद हूमड़ समाज की फिल्म के कुछ अंश आपको देखने के लिए दे सकूंगा.....
-अमी चरणसिंह २५ मार्च २०१०
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Wednesday, March 24, 2010
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